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थप्पड़ परम्परा

“थप्पड़ परम्परा!”दिल के नक़्शे को बदल कर रख दिया है, गालों पर पड़े थप्पड़ ने!हाँ! अभी “थप्पड़” देख रही हूं मैं!यूँ तो अकेली ही हूँ….!पर यूँ लग रहा है कि जैसे कई कई …शायद हज़ारों…

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पूरी होनी चाहिए ज़रूरतें, ख़्वाहिशों को इंतज़ार करने दीजिए…..

आख़िर वो सुबह आ ही गई!जिसका हम सभी को था इंतज़ार !इतने दिनों,महीनों के बाद खुला है लॉक डाउन ! खिले हैं लोग !और निकल पड़ी हूँ मैं बाज़ार की ओर…जैसे कोई आज़ाद पंछी भरता…

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