सोचने वाली बात 03 : क्या ये भी अब दूसरे ही तय करेंगे कि हमारे जीने की दशा और दिशा क्या होगी !

प्यारे दोस्तों,
बेहद स्वागत है आप सभी का सोच और समझ के इस नुक्कड़ पर जहाँ हम मिलते हैं बस ख़ुद ही से, अपने आप से !
हाँ ! पर मैं माफ़ी चाहती हूं इतने लंबे अंतराल के बाद आपसे मिलने के लिए….

आपने देखा होगा कि अक्सर हमारे परिवार में ही ,हमारा कोई अपना ही, ऐसा होता है जो परिवार के बाक़ी दूसरे सदस्यों के लिए आफत बना होता है !
बाक़ी सारे उसके व्यवहार से हैरान – परेशान होते रहते हैं ! पर कुछ कह नहीं पाते ! कुछ कर नहीं पाते ! डर, असुरक्षा या लोक लिहाज़ के चलते !

कुछ ऐसी ही स्थिति कार्यक्षेत्र में भी होती है जब कोई तथाकथित अफ़सर अपने बॉसिज़म से बाज़ नहीं आता !!! ऐसे में पीड़ितों की संख्या कई गुना बढ़ जाती है क्योंकि अक़्सर आदर्श से विपरीत अपने मातहतों ( आधीन कर्मचारियों) से दुर्व्यवहार रखने वाले कुटिल व्यक्ति , कपटपूर्वक किसी भी संस्था में एक ओहदे पर तो पहुंच जाते हैं ! किसी बड़े पद पर होते हैं ! तभी उनके लिए भी सम्भव होता है अपने अधिकार क्षेत्र में आने वाले लोगों को बुरी तरह प्रभावित करना !

यहां तक कि आज के दौर में तो ऐसे महानुभाव हमें सड़क पर भी मिल जाते हैं ! जो अक़्सर किसी दूसरे से बुरी तरह चिल्ला चोट कर रहे होते हैं ! रुआब झाड़ रहे होते हैं !

अब सवाल ये है कि ऐसे तथाकथित महानुभावों के प्रति हमारा व्यवहार कैसा होना चाहिए ? क्या हमें भी उन्हीं की तरह बदसलूकी पर उतर आना चाहिए ? या फ़िर उनकी पीठ पीछे उनकी बुराई करके ,उनके लिए अपशब्दों का इस्तेमाल कर अपना गुस्सा और खीज उतार लेनी चाहिए !

पर सोचने समझने वाली बात तो ये है दोस्तों कि इससे आख़िर होना क्या है….!
क्योंकि ऐसे लोग और ऐसी परिस्थितियां आए दिन हमारे सामने होती हैं । यदि हम हर रोज़ बल्कि हर परिस्थिति में उनसे निपटने की सोचते रहें और उनसे एक बेहद शालीन ,सभ्य और संयमित तरीके से पेश भी आ जाएं तब भी बहुत मुमकिन है कि वो लोग अपनी आदत और फ़ितरत से बाज़ न आएं..!
ग़ौर तलब है कि यहाँ हमें औरों के बदले ख़ुद ही पर ध्यान देना होगा अर्थात ख़ुद ही से निपटना होगा …. और ख़ुद ही तय करना होगा कि ज़रूर हम ये निर्धारित नहीं कर सकते कि कोई और हमारे साथ क्या करेगा पर हर हाल हम ही तय करेंगे कि हम उसके साथ क्या करेंगे । क्योंकि हर वो शख़्स सो सदैव शांत, प्रसन्नचित और स्फूर्तिवान दिखाई देता है इसका अर्थ ये नहीं है कि उसके इर्द गिर्द नकारात्मक लोग या परिस्थितियां नहीं हैं पर ज़रूर ये वो शख़्स है जिसने उनपर ध्यान देने के बदले स्वयं पर काम किया है। ज़िंदगी की गाड़ी तो सभी की एक सी ही होती है दोस्तों, …हाँ! मगर सफ़र खुशनुमां होगा या बोझिल ये तो ज़िंदगी जीने की कुशलता पर ही निर्भर करता है । मतलब कोई और हमारे साथ कितना भी बुरा सुलूक क्यों न करें परन्तु हमें उनसे कितना और कब तक प्रभावित होना है, कितना नहीं ….कमसकम ये तो हमें ही सोचना और तय करना होगा न !
और यक़ीन जानिए प्यारे दोस्तों,
ये इतना नामुमकिन भी नहीं…तो आइए करते हैं शुरुआत ……बचा लेते हैं अपने हिस्से का अपना सुक़ून…..निभा लेते हैं अपनी ख़ुशी को बरक़रार रखने की हमारी अपनी ज़िम्मेदारी…..उठा लेते हैं बीड़ा अपने अन्तस् की शांति बनाए रखने का खुद ही…..और बढ़ चलते हैं आगे ,बग़ैर रुके और थमें …क्योंकि ज़िन्दगी इतनी लम्बी भी नहीं कि ग़ैर ज़रूरी बातों पर रुक कर, ठहर कर बस एवें ही ज़ाया कर दी जाए….मज़ा तो तब है जब कि दुश्मनों के तमाम मंसूबों और साजिशों को नाकाम कर हम बढ़ चलें हर पल अपनी मन्ज़िलों पर मुस्कुराते हुए …..कि किसी और के बुरे बर्ताव से अब न हम अपना मन खराब करेंगे न दिमाग़ ,और न ही मूड ….है न !

बहुत शुक्रिया….

By Dr. A. Bhagwat

founder of LIFEARIA

प्यारे दोस्तों,बेहद स्वागत है आप सभी का सोच और समझ के इस नुक्कड़ पर जहाँ हम मिलते हैं बस ख़ुद ही से, अपने आप से !हाँ ! पर मैं माफ़ी चाहती हूं इतने लंबे अंतराल…

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