चलती का नाम गाड़ी और बढ़ती का नाम ज़िन्दगी

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बढ़ती का नाम ज़िन्दगी…

दम भर……जो थमें तो जाना…….दरअसल वो जीने के लिए ही मिली थी……जिस “ज़िन्दगी” को लेकर न जानें कितनी सदियों से सिरफ़ सोच ही रहे हैं हम !!!
ज्यूँ सागर किनारे मोती पाने के ख़्वाब में ग़ुम हो कोई!! ये भूल कर कि जिसे पार करना हो न, उसके आर-पार जाना पड़ता है!
यूं किनारे खड़े होने से ही कश्तियाँ पार नहीं हुआ करती…..जीवन में उतरे बग़ैर ही, उसमें धसें बग़ैर ही भला कैसे उबरेंगे हम! हाँ, ज़रूर किसी के लिए लायब्रेरी से लाकर ,पढ़कर लौटाने वाली क़िताब हो ज़िन्दगी….! पर कुछ ऐसे भी होते हैं जो इसके हर पन्ने पर अपने अदद दस्तख़त छोड़ते हैं!
अब आख़िर ये हमें ही तय करना होगा न कि हम उस ज़िंदगी का क्या करेंगे जो किसी की भी होने से पहले हमारी अपनी है! ज़रूर हमें ये हक़ है कि हम इसे किसी के नाम कर दें ! पर ये ध्यान में रखते हुए ही कि वसीयतें बदली भी जा सकती हैं लोगों के बदल जानें पर! ज़िन्दगी के उस ख़ज़ाने को बचाकर बढ़ना होगा आगे जो किस्मत ने हमारे नाम लिख्हा है । और ये भी कि जीना सिर्फ़ हक़ ही नहीं बल्कि ज़िम्मेदारी भी है हमारी ……न्याय करना उस हर एक सांस ,हर एक लम्हें के साथ जो बख्शा गया है हमें….बड़ी ही उम्मीदों के साथ!
जिस तरह ग़लती पर डांट मिलती है माता पिता से हमारे,उसी तरह ज़िन्दगी भी कुछ थपेड़े ज़रूर मारती है मुंह पर हमारे……जब कभी हम राह से भटक जाएं या अपेक्षाओं पर खरे न उतरें ज़िन्दगी के!!!!
हर बार इस उम्मीद इस आशा के साथ कि हम कुछ सीखेंगे, संभलेंगे, समझेंगे और आगे बढ़ेंगे…! क्योंकि चलती का नाम गाड़ी और बढ़ती का नाम ज़िन्दगी!!…. है न!
तो प्यारे दोस्तों जब कभी भी यूं लगे कि रुक गई है थम सी गई है ज़िंदगी तो थम न जाएं हम भी!!! ये भूल कर कि अक़्सर बस वही बांध लेते हैं हम गठरी में अपनी जो यहीं छूट जाना है और सुक़ून और आनन्द का हर लम्हा ही काम आना है! तो क्यों न !
रुकी-रुकी सी थमी-थमी सी ज़िन्दगी के माथे को फ़िर चूम कर बढ़ चले आगे…और आगे। क्योंकि जिस मोड़ पर भी उलझनें, नाकामियां, परेशानियां, दुश्वारियां, रुस्वाइयाँ ,ग़लतफहमियां खड़ी हैं न! ज़िन्दगी के उस मोड़ से बस अगले ही मोड़ पर यक़ीनन मिलेंगी हमें…..खुशियां, उम्मीदें,सहूलतें,सुलझने और लाख गिर कर भी फ़िर फ़िर उठने के हौसलें …..क्योंकि भला हम ये कैसे भूल सकते हैं कि ज़िन्दगी जीने और लगातार जीते चले जाने का नाम है! रुकने, थमने और सड़ने का नहीं….है न!
बहुत शुक्रिया

बढ़ती का नाम ज़िन्दगी… दम भर……जो थमें तो जाना…….दरअसल वो जीने के लिए ही मिली थी……जिस “ज़िन्दगी” को लेकर न जानें कितनी सदियों से सिरफ़ सोच ही रहे हैं हम !!!ज्यूँ सागर किनारे मोती पाने…

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