कविता : मोम

Poem

मोम ( Candle )
मोम को ये ग़लतफ़हमी हो सकती है
कि उससे रोशन होते हैं अँधियारे
और जिन ख़ूबसूरत , बेशक़ीमती ‘स्टैंड्स ‘ पर इतराता है ‘ मोम ‘
वो दरअसल मोम के लिए नहीं
पर रोशनी की आमद के सजदे होते हैं
वर्ना मोम के नसीब में फ़क़त
रोशनी के लिए जलना , सदक़े जाना लिखा होता है !
इसलिए पिघलने से बहुत पहले ;
मोम ; रोशनी के काम आता है
और हम देख पाते हैं , चर्च में किसी के हाथों में आँसुओं के संग – संग , मोम को भी पिघलते हुए !
दुआओं में , उम्मीदों में , सुन्दर सपनों की आस लगाए …… !!
पर ताज़्ज़ुब है कि कुछ लोग ,
महज़ मैडम तुसाद के ‘ म्यूज़ियम ‘ में
ख़ुद को मोम के पुतलों के रूप में देखना चाहते हैं !
जो न जलते हैं ,
न पिघलते हैं , और
न ही किसी रोशनी के काम आते हैं ।


प्रो. भागवत की लिखी कविता ‘मोम’ को उन्हीं की आवाज़ में सुनने के लिए कृपया नीचे दी गई यू ट्यूब लिंक पर क्लिक करें।

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