कविता : नेकी की दीवार

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पेश है मेरी कविता – * नेकी की दीवार*
एक ज़माना था जब ज़िंदा इंसानों को दीवार में चुनवा दिया जाता था……!
दीवार जो बीच में आ जाती तो रिश्तों में दरार आ जाया करती !
 
दीवार जो बन जाती तो घरों के दो हिस्से और परिवारों के बंटवारे हो जाया करते!
ताज़्ज़ुब फिर दीवारों के कान भी होने लगे!
यहां तक कि एशियन पेंट्स से बोलने भी लगी दीवारें..!
दीवारें बेहद खूबसूरत भी होती  हैं जब वो दिलों में नहीं होती..!
हमारे एक पुराने  दुश्मन ने तो बड़ी करते- करते दुनिया की सबसे बड़ी ही बना डाली है दीवार….चायना की!!
पर आख़िर दिन तो सभी के फिरते हैं!
सुना है अब दीवार नेकी तक पहुंच गई है और बन पड़ी है “नेकी की दीवार”..!

डॉ. अनामिका भागवत

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