कविता : तुम पंछी मैं शाख़

hindi kavita poem tum panchi

पेड़ों  पर ही उग आए थे हम – तुम 
प्यार की  बारिश में भीगे – भीगे 
मुहब्बतों की खुशबुओं से महके – महके 
फिर  हालातों की  आँधियों से लड़े थे संग – संग 
 ये  बात और है कि पकते – पकते  उग आए थे  पँख  भी तुम्हारे  और 
पूरी तरह पकने से पहले ही 
नाप ली थी तुमने ऊँचाइयाँ  आकाश की 
और मैं , जो नहीं उगा पाई थी पँख 
फिर भी मायूस नहीं हूँ 
जानती  हूँ  सच  ये  किसी रोज़ , यक़ीनन 
यहीं  ,  इसी पेड़ के नीचे 
ख़त्म  होने से कुछ पहले ,सारे बीज सौंप  जाऊँगी ज़मीं  को  !
लिख  जाऊँगी     एक – एक बीज , एक -एक  नवांकुर , एक – एक  पौधे का हिसाब अपनी  वसीयत में !
फ़ैल  जायेगा  मेरा वज़ूद , यहाँ  – वहाँ  और 
जब लौटोगे  तुम  पंछी बन ….तो

by Dr. A. Bhagwat

पेड़ों  पर ही उग आए थे हम – तुम प्यार की  बारिश में भीगे – भीगे मुहब्बतों की खुशबुओं से महके – महके फिर  हालातों की  आँधियों से लड़े थे संग – संग  ये  बात और है कि पकते…

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