पीर पराई

पीर पराई

नमस्कार प्यारे दोस्तों,
माफ़ी चाहती हूं!
एक लssssम्बे बेमतलब ब्रेक के लिए!
तो कैसे हैं आप सभी ?
उम्मीद करती हूं कि प्रभु की कृपा से सब कुशल मंगल है और आप सभी जहाँ भी हैं ख़ुश हैं!, स्वस्थ हैं!…..और हाँ मैं भी ठीक ही हूं!!
क्या यहाँ आपने ग़ौर फरमाया प्यारे दोस्तों ?
कि आपसे मिले बग़ैर भी मैं कितनी आश्वस्त हूँ कि आप सभी एकदम स्वस्थ और सुखी ही हैं!!
मग़र खुद अपने बारे में मेरा ये ख़याल है कि हाँ! मैं भी ठीक ही हूँ!
मतलब ध्यान देनेवाली बात है न! कि मैं या हम; कभी भी बस एक अपने ही बारे में श्युअर नहीं रहते! या ख़ुद के बारे में उतने विश्वास के साथ नहीं कह पाते कुछ भी जितना कि हम दूसरों के बारे में कहते हैं! क्योंकि अक़्सर हमारे इर्द गिर्द मुस्कुराते चेहरों को देखकर हम ये अंदाज़ा लगा बैठते हैं कि उनकी ज़िंदगी तो बेहतरीन ही होगी! और उनकी ज़िंदगी तो बेहद खुशनुमां है! या फिर उन्हें कोई परेशानी पेश ही नहीं आती होगी! जबकि अपनी किसी छोटी सी दिक्कत को भी हम मैग्निफाइंग ग्लास से देखने लगते हैं! तो जब मैं इतने इतने दिनों तक लापता रही! तो शायद आपको यही लगा हो कि मेरी ज़िन्दगी में सबकुछ अच्छा चल रहा होगा!


और मैंने भी आपके बारे में यही सोचा!!
जबकि बहुत मुमकिन है कि इस दौरान बहुत बड़े बड़े भूचाल आए हों आप मेंसे कई लोगों के जीवन में!!
कई दोस्तों ने देखा होगा ज़िन्दगी का सख़्त से सख़्त चेहरा! भले ही आपने ज़ाहिर न किया हो! पर टूट पड़ा होगा कई लोगों पर दुखों का पहाड़! ज़रूर! कई साथियों के जीवन में शामिल हुआ होगा कोई खूबसूरत मोड़ भी! मगर फिर भी हमारे अंदाज़े पूरी तरह सही नहीं होते कभी!
तो क्यों न कुछ यूं हो कि अगली दफ़ा जब आप और मैं सोचे कुछ यूं किसी के बारे में तो सोचे कुछ हमारी सोच के विपरीत भी! हमारी विचारधारा से हट कर भी! ताकि दिख सके हमें दुख दर्द भी औरों के!, नज़र पड़ जाए हमारी दूसरों की परेशानियों पर भी और हम समझ सकें बड़ी ही सह्रदयता से, बड़े ही प्रेम से,औरों को भी उस गहराई से, उस ईमानदारी से जैसे हम ख़ुद को समझते हैं! ! तो शेष न रहे हमारे जीवन में सम्भावना ग़लतफ़हमियों की!, मतभेदों की! और महसूस कर सकें हम दूसरों का दर्द अपने सीने में ! उनकी उलझनों और समस्याओं को अपनी समझकर सुलझा सकें! और जान सके पीर पराई!…. तभी सम्भव है जीवन की वक्ररेखा का सीधी रेखा में होकर भी जीवित बनें रहना….. है न!
बहुत शुक्रिया …..
डॉ. ए. भागवत

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