ख़्वाहिशों को सिखाइए सब्र का हुनर… कि अभी बहुत ज़रूरतें पूरी करनी हैं |

पूरी होनी चाहिए ज़रूरतें, ख़्वाहिशों को इंतज़ार करने दीजिए…..

आख़िर वो सुबह आ ही गई!
जिसका हम सभी को था इंतज़ार !
इतने दिनों, महीनों के बाद खुला है लॉक डाउन ! खिले हैं लोग !
और निकल पड़ी हूँ मैं बाज़ार की ओर…
जैसे कोई आज़ाद पंछी भरता है नित नई उन्मुक्त उड़ान !
कितना कुछ चाहती हूं मैं, कितना कुछ खरीदना है मुझको !
पर्स टटोला देखा पैसें हैं या नहीं ?
हाँ! पर्याप्त हैं!
बहुत कुछ खरीद सकती हूं मैं….
बाज़ार की रौनक अपने पूरे शबाब पर है !
चारों ओर खुली दुकानें, गाड़ियां,लोग..!
और दिन भर का भरपूर वक़्त मनभर कर शॉपिंग करने के लिए….


मगर ताज़्ज़ुब कि मैं सारा दिन बस टहल कर ही लौट आई !
कुछ खरीदने का मन ही नहीं हुआ !
ग़ौर फ़रमाया तो जाना कि सारी की सारी ख़्वाहिशें बस छूट गई थीं घर ही पर…!!
मगर मैंने देखे थे बाज़ार में ख़्वाहिशों से नहीं पर ज़रूरतों के बोझ तले दबे हुए उदास लोग !
अब सोचती हूँ कि मेरी ख़्वाहिशें,चाहतें जो घर पर छूट सकती हैं ! उन्हें क्यों न घर ही पर छोड़ दिया जाए कुछ और दिन इंतज़ार में क्योंकि अब निकलना होगा मुझको, आपको हम सभी को सरे बाज़ार……सारे नहीं तो क्या हुआ पर कुछ लोगों की ज़रूरत का ख़याल रखते हुए ।
कि हमारी ख़्वाहिशों से भी कहीं कहीं ज़्यादा ज़रूरी है, पूरी की जाना ज़रूरतें उनकी जिनकी ज़िन्दगी में ख़्वाहिशें नहीं पर होती हैं बस चंद ज़रूरतें …….है न!
बहुत शुक्रिया….

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